
भोजपुरी फिल्मों अक्सर अश्लीलता के चलते फिल्म समीक्षकों के निशाने पर रही हैं। द्विअर्थीय शब्द और फूहड़ गानों को निशाने पर रखकर लगभग हर आलोचक ने जी खोल कर भोजपुरी फिल्मों को गालियाँ दी है। और तो और, भोजपुरी फिल्मों पर लोगों का शोषण करने का भी आरोप लगता रहा है। इन सब के बीच अगर कोई निर्माता अपनी फिल्म में कोई सामाजिक सन्देश लेकर आता है तो हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम उस फिल्म का जी खोल कर स्वागत करें। हमारा फ़र्ज़ बनता है कि उस फिल्म को देखने के लिए बाकी सब को प्रोत्साहित करें, ताकि ऐसी फिल्मों को बढ़ावा मिल सके और अच्छी भोजपुरी फिल्मों का चलन शुरू हो सके।
औलाद की कहानी भ्रूणहत्या के ऊपर केन्द्रित की गई है और इस फिल्म के माध्यम से यह दिखाने की कोशिश की गई है कि बेटी बेटा के समान ही होती है, औलाद में कभी भी फर्क नहीं करना चाहिए। साथ ही साथ फिल्म में एक परिवार के संघर्ष को भी दिखाया गया है जहां बड़ा भाई अपने छोटे भाई के पढ़ाई के लिए रात दिन मेहनत करता है और समय आने पर अपने औलाद को अपने भाई के सुपुर्द करने से भी नहीं रुकता है। भोजपुरी फिल्मों के इस दौर में ऐसी कहानियों के साथ बहुत कम फिल्में आ रही हैं जो कि सामाजिक समस्याओं के ऊपर आधारित हैं। ऐसे में औलाद ने पुराने ढर्रे पर चलने के बजाय नया करने की कोशिश की है।
यह फिल्म भोजपुरी फिल्मों में चले आ रहे मारकाट और आयटम गीत के फार्मूला को खारिज करती है। इस फिल्म में कोशिश की गई है कि दर्शकों को कुछ अपना सा दिखे, जिसे देख कर दर्शक कह सकें कि हाँ, यह सब हमारे यहाँ गाँव में भी होता है। यह फिल्म अपने आप में इसलिए भी शानदार कोशिश कही जा सकती है क्योंकि इस फिल्म के निर्माता दिनेश लाल यादव है और फिल्म के नायक होते हुए भी उन्होंने एक नारी प्रधान फिल्म बनाने कि कोशिश की है, जो कि एक सराहनीय कदम है।
जी हाँ यह फिल्म १०० प्रतिशत परफेक्ट नहीं है, कुछ कमियाँ हैं इस फिल्म में, लेकिन तब भी आप इस कोशिश को नकार नहीं सकते। भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को गरियाने वाले, और उसके आलोचक बहुत हैं यहाँ पर, लगभग हर फिल्म पर उंगली उठाई जाती है, निर्माता-निर्देशक-नायक और फिल्म से जुड़े तमाम लोगो को गालियाँ दी जाती हैं। लेकिन एक बढ़िया कोशिश को सराहा नहीं जाता, उसके लिए किसी धन्यवाद नहीं कहा जाता। क्या हम सिर्फ गरियाने का ठेका लेकर बैठे हुए हैं ? क्यों नहीं उठ कर अच्छी फिल्मों को सराह रहे हैं ? क्यों नहीं बोल रहे हैं कि हाँ, ऐसी फिल्में बननी चाहिए ? माफ़ करें, मेरा मानना है कि अगर आप अच्छी चीज़ों का स्वागत नहीं कर सकते तो फिर आपका किसी बुरी चीज़ कि आलोचना करने का हक़ भी ख़त्म हो जाता है।
अगर अँधेरे में कहीं दीप दिखता है तो उसे उसका स्वागत करना चाहिए, चुप्पी साध कर बैठने से उस दीप के बुझ जाने का भी खतरा रहता है। बिलकुल यही स्तिथि हमारे इंडस्ट्री के साथ भी है। रौशनी के किरण दिख रही है, कोशिश करिए कि यह किरण भोजपुरी सिनेमा को जगमगा दे। बुरी फिल्मों की आलोचना करिए पर अच्छी फिल्मों का साथ दीजिये, ताकि निर्माताओं और निर्देशकों को पता लगे कि हमें आयटम सांग और मारकाट की नहीं, एक अच्छी पटकथा वाली अच्छी भोजपुरी फिल्म पसंद है।
Source : Editor's Desk
16 comments posted (Showing 1 to 10)हा मैंने भी देखा है नेपाल में ... i liked it but still space to improve....anyway a good movie
Posted by : mithilesh chaurasiya nepal at 01:42:15 on 2012-04-09
kuchh gathia singer ke karn bhojpuri cenema ki badnami hota hai magar hum apna soch badalte hai to Badlaw apneap hoga......
Posted by : Chandan at 18:04:56 on 2012-03-20
Dinesh g ke to ham bahut pasand karila aur unke film k bhi lekin kabse? jab se hum unkake janit han. (nirahua riksha wala
Posted by : kurban khan at 16:22:20 on 2011-10-04
ka ho dinesh bhaiya ka hal chal ba sab thik thak ba nu aab ballia me naikhe aave ke ba ka bada din hogail tohake dekhale .....8604519308
Posted by : nandan giri at 12:03:49 on 2011-09-13
आप की साइड तो बहुत सी जानकारिय देती है अगर थुड़ी जानकारी फिल्म की ऑडिशन के बारे बता डे की कहा ऑडिशन हो रहा हाय तो हम लोगो का भी खुछ भला हो जाये !
Posted by : Anurag kumar at 14:54:47 on 2011-08-26 See_User_Profile
आप की साइड तो बहुत सी जानकारिय देती है अगर थुड़ी जानकारी फिल्म की ऑडिशन के बारे बता डे की कहा ऑडिशन हो रहा हाय तो हम लोगो का भी खुछ भला हो जाये !
Posted by : Anurag kumar at 14:54:47 on 2011-08-26 See_User_Profile
दिनेश जी का यह प्रयास निस्संदेह सराहनीय है. मेरी तरफ से उन्हें और उनकी पूरी टीम को हार्दिक बधाई !
Posted by : K. MANOJ SINGH. film writer at 23:47:27 on 2011-07-25
जय राम जी की
Posted by : harikesh at 15:29:02 on 2011-07-25
pahle ane dijya aullad ko
Posted by : arun kumar gupta at 11:56:33 on 2011-07-25
अरे यह क्या कर रहे हैं ? दूकान बंद करनी है क्या इन आलोचकों की ? हमारे यहाँ आलोचक सिर्फ गालियाँ देने का काम करते हैं. ठेकेदार और इन आलोचक्लों में कोई अंतर नहीं है. एक अच्छी फिल्म बनी और बोलती बंद. मुह फाड़े रहते थे अभी तक ऐसे लोग, अब लगता है मुह सिला गया है
Posted by : balwinder at 16:18:58 on 2011-07-21
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