"एक्शन वाला पोस्टर, रोमांस वाला पोस्टर" - आज के सिनेमा इंडस्ट्री में ये में यह लाइन काफ़ी आम हो चुकी है। और भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्री भी इससे अछूती नहीं रही है। फ़िल्म के पोस्टरों को अब दो श्रेणीयों में बाँट दिया गया है। एक पोस्टर है जिसमें एक्शन की भरमार हो, खुन खराबा, कट्टा, तोप सब कुछ हो, और दूसरा है रोमांस वाला पोस्टर, जिसमें हिरो अपने हिरोइन के करीब हो, और साथ में एक आयटम डांसर हो। अब फ़िल्मों के पोस्टरों को फ़िल्म के नाम से, फ़िल्म के थीम से कोइ लेना देना नही रह गया है।
मेरा मानना है कि फ़िल्म के पोस्टर फ़िल्म के बारे में बहुत कुछ कह जाते हैं। "थ्री इडियट्स" का ही उदाहरण लिजिये, पोस्टरों पर छपे गणित के फ़ाँर्मूले अपने आप में बहुत कुछ कह जाते हैं, उन्हें देखते ही यह दर्शक यह भाँप लेता है कि फ़िल्म छात्रों की शिक्षा को ध्यान में रखकर बनाइ गई है। "दबंग" फ़िल्म का आयटम साँग "मुन्नी बदनाम हुइ" काफ़ी प्रसिद्ध हुआ पर इस फ़िल्म के पोस्टरों पर हमें सलमान खान ही दिखाइ दिये वो भी उस रूप में जिसे देखते ही लोगों को दबंगई का अहसास हो जाये। पोस्टर फ़िल्म का ही एक आयना होता है जो ये बताता है कि फ़िल्म किस चीज़ को केन्द्रित कर के बनाइ गई है। पर शायद अब यह बात लागू होती है। अब पोस्टर फ़िल्म के कलाकारों को दिखाने के लिये बनाया जाता है, फ़िल्म की थीम दिखे ना दिखे।
फ़िल्म का टाइटल हटा कर अगर हम दर्शकों को दिखायें तो इक्का दुक्का पोस्टरों को छोड़ दें तो शायद ही कोइ दर्शक फ़िल्म का नाम बता सकता है। जबकि हम हिन्दी फ़िल्मों के साथ यह करें तो दर्शकों को शायद ही फ़िल्म पहचानने में कोइ दिक्कत हो। इसका प्रमुख कारण यही है कि हम फ़िल्म के पोस्टरों के उपर खास ध्यान नही देते। यहाँ ध्यान देने का मतलब यह नही है कि हम पोस्टरों के डिजाइन पर ध्यान नहीं देते, इसका मतलब यह है कि हम फ़िल्म के थीम को पोस्टर पर दिखाने पर ध्यान नही देते।
जिस तरह से लगातार फ़िल्मों के पोस्टर दोहराव के शिकार बन रहे हैं, उस गति से तो लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब फ़िल्म का नाम होगा "हे गंगा मय्या" और पोस्टर में उठापटक, खून खराबा और आयटम डांसर ही दिखाइ देंगी। फ़िल्म के हर विभाग को उचित समय दे कर ही अच्छी फ़िल्म बनाइ जा सकती है और दुखद बात यह है कि वर्तमान में पोस्टर के ऊपर कोइ खास समय नहीं दिया जा रहा है।
वैसे, इन सब का कारण यह भी हो सकता है कि जब फ़िल्में ही दोहराव का शिकार बन रही हैं तो फ़िल्म के पोस्टर की बात बेइमानी सी लगती है। आशा है कि हमारे निर्माता-निर्देशक इन बातों पर आगे ध्यान देंगे और आगे ऐसे पोस्टर और फ़िल्म के साथ आएंगे जो दर्शकों को सालों बाद भी याद रहे।
1 comments posted (Showing 1 to 1)बिलकुल, पोस्टर की थीम तो होनी ही चाहिए क्यूंकि आज भी दर्शकों को सिनेमा घर तक लाने के लिए सबसे मजबूत माध्यम फिल्म का पोस्टर ही होता है चाहे वो भोजपुरी हो या हिंदी फिल्म. थीम इसलिए भी होनी चाहिए क्यूंकि किसी भी फिल्म का पोस्टर एक लुक मैं फिल्म के पीछे की सोच का उजागर करता है. मैंने अपनी फिल्म "अचल रहे सुहाग" मैं ऐसी ही कोशिश की है और उम्मीद है की दर्शको को ये पसंद आएगी.
Posted by : Abhilash Sharma at 21:45:10 on 2011-12-25
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