भोजपुरी फ़िल्मों में बढ़ती हुई अश्लीलता से आज हमारा पूरा समाज परेशान है। ज्यादातर लोगों का कहना है कि वे भोजपुरी फ़िल्में इसलिये नहीं देखते क्योंकि भोजपुरी फ़िल्मों में द्विअर्थी संवाद और फ़ूहड़ता के अलावा उन्हें फ़िल्मों में कुछ और नहीं दिखाइ देता। आज ज्यादातर लोग अपने परिवार के साथ भोजपुरी फ़िल्म देखने में कतराते हैं क्योंकि उन्हें खुद पता नहीं रहता कि जाने कब फ़िल्म में कुछ ऐसे संवाद या दृश्य आ जायें जिसकी वजह से हम अपने परिवार वालों से ही नज़रें ना मिला पायें। इसी वजह से हम भोजपुरी फ़िल्मों से कटते चले जा रहे हैं। पर यहाँ एक सवाल उठता है कि अगर हर कोइ भोजपुरी फ़िल्मों से दूर होता जा रहा है तो फ़िर लगातार भोजपुरी फ़िल्में क्यों बन रही हैं ? क्यों भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्री लगातार विकास कर रही है ?
इस सवाल के कई जवाब बन सकते हैं, पर मुझे सबसे उचित जवाब तो यही लगता है कि आज भी हमारे समाज में एक बहुत बड़ा वर्ग है जो कि इस फ़ूहड़ता को देखने में कोइ बुराइ नहीं समझता है। और तो और, दर्शकों का तो एक ऐसा वर्ग भी है जो फ़िल्मों में सिर्फ़ आयटम डाँस ही देखने आता है। मुझे पता है कि कई लोग मेरे इस विचार का विरोध करेंगे, पर दुखद बात यह है कि यह विचार सही है। "गमछा बिछाइ के", "हमका ऊ चाही", "कमरिया लचके लपालप" जैसे गाने अपने आप ही प्रसिद्ध नहीं हो गये, ये गाने प्रसिद्ध हुये क्योंकि श्रोताओं ने इसे सराहा। सुनने में यह बात बहुत बुरी लगती है, पर सच तो यही है। एक तरफ़ जहाँ कुछ लोग अश्लीलता के खिलाफ़ कदम उठा रहे हैं, वहीं हमारे ही कुछ बंधु ऐसे गाने सुन के मस्त हुये जा रहे हैं।
अगर कोइ बचाव के लिये यह कहता है कि हमारे भोजपुरिया दर्शक मजबूरी में ऐसी फ़िल्में देखते हैं क्योंकि उनके पास कोइ और फ़िल्म ही नही होती देखने के लिये, तो माफ़ करें पर शायद आपको याद हो कि भोजपुरी फ़िल्मों क दौर दो बार पहले भी आ चुका है और अच्छी फ़िल्मों के अभाव में खत्म भी हो चुका है। तो क्या उस समय दर्शकों की मजबूरी नही थी कि वह खराब फ़िल्मों को ही बढ़ावा देते ? हम बार बार निर्माता, निर्देशकों, गीतकारों और संगीतकारों की आलोचना करते हैं, पर यह क्यों भूल जाते हैं कि हमारा समाज का एक वर्ग इन्हें अपना रहा है तभी तो यह आगे बढ़ रहे हैं। जिस दिन हम इन्हें नकार देंगे, उस दिन अश्लीलता को हटाने का आधा काम तो अपने आप ही खत्म हो जायेगा। इन बातों को सामने रख के यह ना समझे कि हम अपने निर्माता निर्देशकों का बीच बचाव कर रहें हैं। भोजपुरी फ़िल्मों को लगातार हर क्षेत्र में विकास की जरुरत है और अगर हमारे समाज का वर्ग ही ऐसी फ़िल्में डिमांड करेगा तो अश्लीलता के खिलाफ़ उठ रहे हर कदम को करारा झटका लगेगा। अगर हम निर्माता, निर्देशकों, गीतकारों और संगीतकारों की आलोचना कर रहे हैं, तो हमारा यह भी फ़र्ज़ बनता है कि ऐसे सामाजिक तत्वों को भी अच्छी भोजपुरी फ़िल्मों और संगीत से अवगत करायें। भरोसा रखें, जिस दिन हमारे समाज का कोइ भी वर्ग अश्लीलता का साथ नहीं देगा, उस दिन "गंगा मय्या तोहे पियरी चढ़ईबो" जैसी फ़िल्म फ़िर से बनेगी।
Source : EDITORIAL
2 comments posted (Showing 1 to 2)देखिये भोजपुरी फिल्म न देखना और न बोलना दोनों अलग बात हैं. ठीक है आप भोजपुरी सिनेमा मत देखियी मगर आप भोजपुरी भासा तोह बोलना मत बंद किजियी. प्रॉब्लम यही पह है. भोजपुरी सिनेमा बाद में आई भासा तोह पुराणी थी न मगर हुवा क्या लोग भोजपुरी बोलना छोड़ते गए और ईनकी जगह पर निम्न बर्गा, अनपढ़, लोग लेते गए सो हुवा क्या फिल्मे बनी मगर किसके लिए तोह वही निम्न बरगो के लिए. तोह उनकी डिमांड बढ़ी और फूहड़ फिल्मे गाने बन्ने लगे. अगर ऐसा न होता उच्च बर्ग के लोग भी भोजपुरी को अपना भाषा समघ ते तोह ऐसा कदापि नहीं होता.. फूहड़ फिल्मे न देखे, फूहड़ गाने न सुने मगर जो भी अछि है उसे तोह अपनाये. अभी क्या हो रहा है
Posted by : mithilesh chaurasiya nepal at 22:55:11 on 2012-04-08
सही बात कही है आपने. इसका मुख्य कारन है की लोगो का कम पढ़ा लिखा होना और नैतिक सिक्षा की कमी. जिसके कारन भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री बदनाम भी हो रही है. इसी फुहर्ता और अश्लीलता के कारन आज तक मेने सिर्फ २ ही भोजपुरी फिल्मे दिखी है. १) ससुरा बड़ा पैसा वाला, और २) बंधन टूटे न.
Posted by : Arun tiwari Surat at 13:33:10 on 2012-03-29
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